जुलाई 9, 2026

उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन शिमला में करेंगे ‘वंदे मातरम्: एक यात्रा’ प्रदर्शनी एवं त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस), राष्ट्रपति निवास, शिमला, जो मानविकी, सामाजिक विज्ञान तथा साहित्य के क्षेत्र में देश के अग्रणी उच्च शोध संस्थानों में से एक है, 10 से 12 जुलाई 2026 तक ‘सरदार पटेल की दृष्टि: एकीकरण, एकात्मता और संघवाद’ विषय पर त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन करेगा। इस संगोष्ठी का उद्घाटन भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन द्वारा किया जाएगा। इस अवसर पर वे ‘वंदे मातरम्: एक यात्रा’ शीर्षक से आयोजित विशेष प्रदर्शनी का भी उद्घाटन करेंगे।

यह संगोष्ठी भारत के राजनीतिक एकीकरण के प्रमुख शिल्पकार सरदार वल्लभभाई पटेल के असाधारण योगदान का पुनर्पाठ करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। अपने अद्वितीय नेतृत्व, दूरदर्शिता और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने 560 से अधिक देशी रियासतों का शांतिपूर्ण एकीकरण कर आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की आधारशिला रखी। यद्यपि राष्ट्रीय एकीकरण में उनके योगदान को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है, तथापि यह संगोष्ठी उनकी संवैधानिक दृष्टि, प्रशासनिक दर्शन, सहकारी संघवाद की अवधारणा तथा समकालीन राष्ट्रीय एवं वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता का गहन अकादमिक विश्लेषण करने का प्रयास करेगी।
आज जब विश्व के अनेक राष्ट्र राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय आकांक्षाओं, संवैधानिक संघवाद, सुशासन, आंतरिक सुरक्षा, पहचान-आधारित राजनीति तथा भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं जैसी जटिल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, ऐसे समय में यह संगोष्ठी इस प्रश्न पर गंभीर विमर्श करेगी कि क्या सरदार पटेल के विचार आज भी लोकतांत्रिक संस्थाओं, संवैधानिक शासन व्यवस्था तथा राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए सार्थक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। संगोष्ठी में सरदार पटेल को केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि समकालीन सार्वजनिक नीति और राष्ट्र-निर्माण के लिए प्रेरणास्रोत जीवंत वैचारिक परंपरा के रूप में समझने का प्रयास किया जाएगा।

‘विकसित भारत’ की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में अग्रसर भारत के लिए यह अकादमिक विमर्श विशेष महत्त्व रखता है। केन्द्र-राज्य संबंध, संतुलित क्षेत्रीय विकास, प्रशासनिक दक्षता, आंतरिक सुरक्षा, सहकारी संघवाद तथा संवैधानिक शासन से जुड़े प्रश्न आज भी भारतीय लोकतंत्र के विकास की धुरी बने हुए हैं। वर्तमान परिस्थितियों में सरदार पटेल के राजनीतिक चिंतन का पुनर्मूल्यांकन इन राष्ट्रीय विमर्शों को नई दिशा प्रदान कर सकता है।

इस संगोष्ठी की परिकल्पना एक बहु-विषयक मंच के रूप में की गई है, जिसमें इतिहासकार, राजनीतिशास्त्री, संवैधानिक विशेषज्ञ, समाजशास्त्री, लोक प्रशासन के विद्वान, विधि विशेषज्ञ, सामरिक मामलों के जानकार, पत्रकार तथा शोधकर्ता एक साथ विचार-विमर्श करेंगे। प्रतिभागी सरदार पटेल के योगदान का अध्ययन केवल भारत के राजनीतिक एकीकरण तक सीमित न रखकर भारतीय संघीय व्यवस्था, प्रशासनिक संस्थाओं, अखिल भारतीय सेवाओं, राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना तथा संवैधानिक लोकतंत्र के विकास के व्यापक संदर्भ में करेंगे।

संगोष्ठी की अवधारणा-पत्रिका इस बात पर विशेष बल देती है कि सरदार पटेल एक ऐसे सशक्त संघीय ढांचे के पक्षधर थे जिसमें केन्द्र और राज्यों के बीच सहयोग, परामर्श तथा परस्पर विश्वास का संतुलन बना रहे। उनके लिए संघवाद केवल संवैधानिक प्रावधानों तक सीमित अवधारणा नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक वैधता, राष्ट्रीय उत्तरदायित्व तथा सहमति-आधारित शासन व्यवस्था का आधार था। यही दृष्टिकोण आज भी सुशासन, विकेन्द्रीकरण तथा सहकारी संघवाद से जुड़े विमर्शों में अत्यंत प्रासंगिक है।

संगोष्ठी में सरदार पटेल के राष्ट्रीय एकीकरण के दर्शन, देशी रियासतों के विलय, केन्द्र-राज्य संबंधों, समकालीन भारतीय संघवाद, प्रशासनिक तंत्र, नौकरशाही, राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीतिक नेतृत्व, क्षेत्रीय असमानताओं, संवैधानिक विकास तथा विविधता में एकता को सुदृढ़ करने में उनके विचारों की निरंतर प्रासंगिकता जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी। साथ ही संघवाद एवं राष्ट्र-निर्माण के वैश्विक अनुभवों का तुलनात्मक अध्ययन भी इस विमर्श का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होगा।

इस संगोष्ठी की एक विशिष्ट विशेषता देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों, इतिहासकारों, संवैधानिक विशेषज्ञों तथा सार्वजनिक बुद्धिजीवियों की सहभागिता होगी। प्रमुख वक्ताओं में प्रो. गीता धर्मपाल, पूर्व प्राध्यापक, साउथ एशिया इंस्टीट्यूट, हीडलबर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी तथा वर्तमान में गांधी रिसर्च फाउंडेशन, जलगांव की मानद शोध अधिष्ठाता शामिल हैं, जो ऑनलाइन माध्यम से ‘इंटीग्रेशन ऐज़ धर्म: सरदार पटेल का गांधीवादी राज्य-शिल्प और भारत का निर्माण’ विषय पर व्याख्यान देंगी। अंतरराष्ट्रीय सहभागिता में प्रो. लावण्या वेंमसानी, शॉनी स्टेट यूनिवर्सिटी, ओहायो (अमेरिका) की भारतीय इतिहास एवं धर्म की प्रख्यात विदुषी, हैदराबाद राज्य के एकीकरण में सरदार पटेल की भूमिका पर अपने विचार रखेंगी। इसके अतिरिक्त सोफिया विश्वविद्यालय के प्रो. कुन्दन सिंह ‘श्री अरविंद और सरदार पटेल’ विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान देंगे।

संगोष्ठी के अन्य प्रमुख आकर्षणों में हैदराबाद, कश्मीर, पंजाब की पहाड़ी रियासतों तथा ओडिशा की रियासतों के एकीकरण पर विशेष सत्र, भारतीय सिविल सेवा के निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं प्रशासनिक सुधार, महात्मा गांधी एवं श्री अरविंद के साथ उनके वैचारिक संबंध, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण, राजकोषीय संघवाद, संवैधानिक विकास, अभिलेखीय विरासत, राष्ट्र-निर्माण तथा समकालीन संघीय लोकतंत्रों के समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर गहन विमर्श शामिल हैं। इन सत्रों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, सिक्किम विश्वविद्यालय, हीडलबर्ग विश्वविद्यालय, शॉनी स्टेट यूनिवर्सिटी (अमेरिका), सोफिया विश्वविद्यालय तथा देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों के विद्वान भाग लेंगे।

उद्घाटन समारोह के अवसर पर संस्थान की कई महत्त्वपूर्ण अकादमिक प्रकाशनों का लोकार्पण भी किया जाएगा। इनमें ‘वंदे मातरम्: एक यात्रा’ पर आधारित कॉफी टेबल बुक, ‘Eternal Radhakrishnan: Darshana, Temporality, and the Man’ शीर्षक संगोष्ठी कार्यवाही तथा डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को समर्पित बहुभाषी कविता-संग्रह शामिल हैं। इसी अवसर पर उद्घाटित होने वाली ‘वंदे मातरम्: एक यात्रा’ प्रदर्शनी भारत के राष्ट्रीय गीत के ऐतिहासिक विकास, स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका तथा राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में उसके योगदान को रेखांकित करेगी। इस प्रदर्शनी की परिकल्पना एवं क्यूरेशन सुप्रसिद्ध शोधकर्ता एवं लेखक श्री अखिलेश झा द्वारा किया गया है, जबकि श्रीमती रश्मिता झा इसकी सह-क्यूरेटर हैं। प्रदर्शनी के सृजनात्मक एवं शोधपरक स्वरूप को समृद्ध बनाने में कुमारी श्रेयसी झा का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, जिनके रचनात्मक कार्य ने इसके ऐतिहासिक आख्यान को आकर्षक एवं प्रभावशाली स्वरूप प्रदान किया है।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान निरंतर सभ्यतागत विमर्श, संवैधानिक मूल्यों तथा सार्वजनिक नीति से जुड़े विषयों पर राष्ट्रीय स्तर के बौद्धिक संवाद का एक महत्त्वपूर्ण मंच रहा है। राष्ट्रीय महत्त्व के इस विषय पर प्रतिष्ठित विद्वानों, नीति-निर्माताओं, चिंतकों एवं शोधकर्ताओं को एक मंच पर लाकर संस्थान का उद्देश्य गहन अकादमिक अनुसंधान पर आधारित सार्थक सार्वजनिक विमर्श को प्रोत्साहित करना है।

यह संगोष्ठी सरदार पटेल की वैचारिक विरासत पर नए शोध को प्रोत्साहित करेगी, अंतर्विषयी अध्ययन को बढ़ावा देगी, संघीय शासन व्यवस्था पर प्रमाण-आधारित विमर्श को सुदृढ़ करेगी तथा भारत के संवैधानिक विकास की व्यापक सार्वजनिक समझ विकसित करने में योगदान देगी। इसके निष्कर्ष विद्यार्थियों, शोधार्थियों, सिविल सेवकों, नीति-निर्माताओं, विधि विशेषज्ञों, मीडिया जगत तथा राष्ट्रीय एकीकरण, सुशासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं में रुचि रखने वाले नागरिकों के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होंगे।

अपनी अकादमिक महत्ता के अतिरिक्त यह संगोष्ठी व्यापक सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक है। ऐसे समय में जब सार्वजनिक विमर्श अनेक बार दुष्प्रचार, सामाजिक ध्रुवीकरण तथा विभाजित विचारधाराओं से प्रभावित होता है, विविधताओं के बीच राष्ट्रीय सहमति और एकता स्थापित करने वाले नेतृत्व के विचारों का पुनर्पाठ विशेष महत्त्व रखता है। संवाद, संवैधानिकता, संस्थागत सुदृढ़ता, प्रशासनिक ईमानदारी तथा राष्ट्रीय एकात्मता पर सरदार पटेल का बल आज भी लोकतांत्रिक समाजों के लिए अत्यंत उपयोगी मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है।

यह संगोष्ठी इस विचार को पुनः स्थापित करने का प्रयास करेगी कि राष्ट्रीय एकीकरण केवल इतिहास की उपलब्धि नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रतिबद्धता, जागरूक नागरिकता, सुदृढ़ संस्थाओं तथा सहकारी शासन व्यवस्था पर आधारित एक सतत लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। विद्वत्तापूर्ण संवाद और गंभीर विमर्श के माध्यम से यह आयोजन भारत की राष्ट्र-निर्माण यात्रा की गहरी समझ विकसित करने तथा इक्कीसवीं शताब्दी में सरदार पटेल की दूरदर्शी दृष्टि की निरंतर प्रासंगिकता को रेखांकित करने का प्रयास करेगा।

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