जून 19, 2026

एआई शासन को दृढ़ता से वैज्ञानिक साक्ष्‍यों और मानवाधिकारों पर आधारित होना चाहिए- इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में एंटोनियो गुटेरेस

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट के पाँचवें दिन “अंतरराष्ट्रीय एआई शासन में विज्ञान की भूमिका” विषय पर उच्च-स्तरीय सत्र का आयोजन
माइक्रोसॉफ्ट के वाइस चेयर और प्रेसिडेंट ब्रैड स्मिथ ने जोर देकर कहा, मशीनें लोगों को अधिक बुद्धिमान बनाने और मानवता की मदद करने के लिए बनाई जानी चाहिए
जिम्मेदार एआई अनुसंधान में टिकाऊ निवेश दीर्घकालीन नवाचार के लिए अनिवार्य : सिंगापुर की मंत्री जोसेफिन टीओ
डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना से ग्लोबल साउथ तक: विशेषज्ञों ने समावेशी एआई नीति के मार्ग का खाका पेश किया

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के पाँचवे दिन अंतरराष्ट्रीय एआई शासन में विज्ञान की भूमिका शीर्षक से एक उच्च‑स्तरीय सत्र आयोजित किया गया, जिसमें वैश्विक नेता, वैज्ञानिक, नीति‑निर्माता और उद्योग जगत के प्रतिनिधि एकत्र हुए। इस सत्र में इस बात पर विचार‑विमर्श किया गया कि वैज्ञानिक साक्ष्य किस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदार एआई शासन को मजबूत करने का आधार हो सकते हैं।

इस सत्र में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस; माइक्रोसॉफ्ट के वाइस चेयर और प्रेसिडेंट ब्रैड स्मिथ, और सिंगापुर में डिजिटल विकास तथा सूचना मंत्री जोसेफिन टीओ ने प्रमुख भाषण दिए।

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संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने अपने मुख्य भाषण में ज़ोर देकर कहा कि एआई शासन को दृढ़ता से वैज्ञानिक साक्ष्यों और मानवाधिकारों पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने कहा, “ विज्ञान हमें जानकारी दे सकता हैलेकिन निर्णय मनुष्यों को ही लेने चाहिए। हमारा लक्ष्य यह है कि मानव नियंत्रण केवल नारा भर न रहकर तकनीकी वास्तविकता बने। इसके लिए सार्थक मानवीय निरीक्षणस्पष्ट जवाबदेही और मानवाधिकारों की रक्षा आवश्यक है।

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ब्रैड स्मिथ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एआई को इस तरह से बनाया जाना चाहिए कि वह मानव क्षमता को मजबूत करे। उन्होंने कहा, “असल सवाल यह नहीं है कि क्या हम ऐसी मशीनें बनाएंगे जो कुछ मायनों में इंसानों से अधिक बुद्धिमान हों — हम उन्हें बनाएँगे। असली सवाल यह है कि हम उन मशीनों का उपयोग लोगों को अधिक बुद्धिमान बनाने और मानवता को उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करने में कैसे करते हैं।

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सिंगापुर की मंत्री जोसेफिन टीओ ने अपने मुख्य भाषण में जिम्मेदार एआई अनुसंधान में टिकाऊ निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, एक छोटे देश के रूप में, हम यह मानते हैं कि एआई का उपयोग जन कल्‍याण के लिए किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा करने के लिए यह आवश्यक है कि हम उस विज्ञान में निरंतर निवेश जारी रखें जो भरोसे को मजबूत करता है। इसके लिए अनुसंधान में निरंतर निवेश आवश्यक है, और इसी कारण हमने अपनी राष्ट्रीय एआई योजना के तहत एक बिलियन डॉलर से अधिक राशि अलग रखी है, जिसमें जिम्मेदार एआई पर मौलिक अनुप्रयुक्‍त शोध के लिए भी धन शामिल है। हम इस पर विश्वास करते हैं, और इसी प्रयास के तहत धन लगा रहे हैं।”

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सत्र में एक विशेष चर्चा भी शामिल थी जिसमें विज्ञान पत्रकार और लेखक अनिल अनंतस्वामी और मिला —क्यूबेक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंस्टिट्यूट जोशुआ बेंगियो के बीच चर्चा हुई। उनकी बातचीत इस बात पर केंद्रित रही कि विज्ञान‑नीतिगत इंटरफेस कैसे तेजी से बदलते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं। चर्चा में तटस्थ, साक्ष्य‑आधारित वैश्विक ज्ञान आधार तैयार कर सकने वाले स्वतंत्र वैज्ञानिक सलाहकारी निकायों की आवश्यकता, अनिश्चितता के बीच नीति निर्धारण की चुनौतियों, और तेज़ तकनीकी नवाचार तथा धीमी शासन प्रक्रियाओं के बीच संरचनात्मक तनाव जैसे मुद्दों के बारे में पड़ताल की गई। चर्चा के दौरान एआई शासन को संतुलित, साक्ष्य‑आधारित, और सभी देशों—विशेष रूप से विकासशील देशों के हितों के अनुरूप बनाए रखने के लिए एहतियाती सिद्धांतों, तकनीकी सुरक्षा मानदंडों, बहुपक्षीय सहयोग, और समावेशी वैश्विक भागीदारी की आवश्यकता पर बल दिया गया।

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एक और पैनल चर्चा आयोजित की गई, जिसका संचालन अमनदीप सिंह गिल, अंडर‑सेक्रेटरी‑जनरल, डिजिटल और उभरती प्रौद्योगिकियों के संयुक्त राष्ट्र कार्यालय द्वारा किया गया। इस पैनल में अजय कुमार सूद, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार, भारत सरकार; ऐनी बौवेरोट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए विशेष दूत, फ्रांस सरकार; बलराम रवींद्रन, प्रोफेसर, वाधवानी स्कूल ऑफ़ डेटा साइंस एंड एआई, आईआईटी मद्रास; और सौम्या स्वामीनाथन, पूर्व चीफ़ साइंटिस्ट, विश्व स्वास्थ्य संगठन।

नीति‑निर्माण में साक्ष्य की भूमिका पर विचार करते हुए सौम्या स्वामीनाथन ने कहा, ‘जब नेतृत्व डेटा और साक्ष्यों द्वारा निर्देशित होता है तो विज्ञान में विश्वास बनता है। कोविड के दौरान नीतियाँ उस समय उपलब्ध सर्वोत्तम साक्ष्यों पर आधारित थीं और जैसे‑जैसे नए साक्ष्य सामने आए, उन्हें समायोजित करते हुए सुधारा गया। मुझे लगता है कि हम एआई के साथ भी इसी तरह की स्थिति में हो सकते हैं।’”

एआई के सामाजिक प्रभावों से संबंधित ज्ञान की खामियों को रेखांकित करते हुए बलराम रवींद्रन ने कहा, ‘हम एआई के परिणामों और खासकर ग्लोबल साउथ में यह समाज तथा आजीविका पर कैसे असर डालेगाउसे पूरी तरह नहीं समझते।

ऐनी बौवेरोट ने रोज़गार पर एआई के असर के आधार पर अलग-अलग नीति बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, अगर एआई के संभावित परिणाम स्वरूप नौकरियाँ समाप्त हो जाती हैंतो नीति को सार्वभौमिक मूल आय के बारे में सोचना चाहिए। अगर परिणाम नौकरियों का रूपांतरण हैतो प्रशिक्षणकौशल विकास और पुनःकौशल की नीति होनी चाहिए। इसलिए अर्थशास्त्रियों और श्रम संस्थाओं की बात सुनना बहुत महत्वपूर्ण है।

अजय कुमार सूद ने भारत के अनुभव का उदाहरण देते हुए कहा, ‘हमारा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का अनुभव दर्शाता है कि शासन को तकनीकी डिज़ाइन के माध्यम से अंतर्निहित किया जा सकता है। इसे ही हम तकनीकी शासन कहते हैं। यह सब कुछ हल नहीं कर सकतालेकिन नवाचार और सुरक्षा उपायों के बीच बेहतर इंटरैक्शन प्रदान करता है।

सत्र का समापन इस मजबूत सहमति के साथ हुआ कि विज्ञान को अंतरराष्ट्रीय एआई का आधार होना चाहिए — ताकि एआई का विकास समावेशी, पारदर्शी, साक्ष्य‑आधारित और जन कल्‍याण के अनुरूप बना रहे।”

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