सितम्बर 27, 2026

मन की बात की 138वीं कड़ी में प्रधानमंत्री का सम्बोधन

मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार।

‘मन की बात’ के सितंबर माह में फिर से एक बार आपको मिलने का अवसर मिल रहा है। मैं देश के सभी लोगों का स्वागत करता हूं। ‘मन की बात’ में हम देशवासियों के सकारात्मक प्रयासों को मंच देते हैं। देश की उपलब्धियों की बात करते हैं। भारत की ऐसी ही एक बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि को एक दिन बाद 10 साल होने जा रहे हैं। ये उपलब्धि है ‘Surgical Strike’ की। दस वर्ष पहले 28-29 सितंबर, 2016 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर Surgical Strike की थी। LOC के उस पार जाकर हमारे वीर जवानों ने जिस तरह आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई की थी, वो देख दुनिया हैरान थी। Surgical Strike ने डंके की चोट पर पूरी दुनिया के सामने भारत की आतंकवाद विरोधी नीति का एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया था। आतंकवादी हमलों के कारण भारत ने लंबे समय तक, जो दर्द झेला था, ‘Surgical Strike’ उस कष्ट के खिलाफ हमारी निर्णायक प्रतिक्रिया थी। बीते एक दशक में, बालाकोट की Air Strike से लेकर ‘Operation सिंदूर’ तक भारत ने बार-बार ये स्पष्ट संदेश दिया है कि अगर आतंकवादी भारत पर आंख उठायेंगे, तो उसका करारा जवाब दिया जाएगा।

साथियो,

आतंकवादी हमलों ने भारत को लंबे समय तक चोट पहुंचाई है। एक समय था जब भारत में Serial Blast होना बहुत सामान्य बात हो गई थी। सितंबर के इस महीने में यानि 13 सितंबर, 2008 को दिल्ली में हुए Serial Blast में अनेक निर्दोष लोग मारे गए थे। इसके कुछ सप्ताह बाद ही मुंबई में 26/11 का इतना बड़ा हमला हुआ था।

साथियो,

पहले भी हर आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान पर कार्रवाई की मांग होती थी, लेकिन, उस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता था। समय बीतने का इंतजार किया जाता था। अब आज का भारत आतंकवाद के खिलाफ Zero-tolerance Policy लेकर चल रहा है, और हम, इसके नतीजे भी देख रहे हैं।

साथियो,

इस साल 9/11 के आतंकी हमले को भी 25 वर्ष हुए हैं। अमेरिका के World Trade Centre में जिन निर्दोष लोगों ने अपना जीवन खोया था, उनमें अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा लोग भारत के थे। मुझे याद है, 2014 में PM बनने के बाद जब मैं अमेरिका गया था, तो New York में, मैं इन निर्दोष नागरिकों को अपनी श्रद्धांजली देने पहुँच गया था। और आज फिर एक बार मैं भारत के करोड़ों नागरिकों की ओर से पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करता हूं। 

मेरे प्यारे देशवासियो,

इन दिनों देश की एक बहुत बड़ी तस्वीर तैयार हो रही है। इस तस्वीर में आप भी हैं, आपका परिवार भी है, आपके अड़ोस-पड़ोस के लोग भी हैं। मैं बात कर रहा हूं, भारत की जनगणना की। देश के सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में इसका पहला चरण लगभग पूरा हो चुका है। 32 करोड़ से अधिक परिवारों की जानकारी दर्ज की जा चुकी है। इन दिनों लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के दुर्गम और बर्फीले इलाकों में भी ये काम चल रहा है। वहां से कई प्रेरक अनुभव हमारे सामने आए हैं। उत्तराखंड में जनगणना की शुरुआत चमोली के माणा गाँव से हुई। माणा को देश का पहला गाँव कहा जाता है। माणा में सबसे पहले 83 साल की पूर्णिमा रावत जी से इसकी शुरुआत हुई। उत्तरकाशी के बगोरी गाँव में Homestay चलाने वाले हरदेव सिंह राणा जी ने Digital माध्यम से अपनी जानकारी स्वयं दर्ज की।

साथियो,

जनगणना हम सबका राष्ट्रीय दायित्व है। मैंने 15 अगस्त को भी देशवासियों से आग्रह किया था कि इसके लिए अपना समय जरूर निकालें। जनगणना के लिए अपनी जानकारी स्वयं दर्ज करने की ये सुविधा बहुत आसान है। आप अपने Mobile से ही अपनी और अपने परिवार की जानकारी दर्ज करा सकते हैं। ये सुविधा हिन्दी सहित 16 भाषाओं में उपलब्ध है। साथियो, इसके लिए आपको जनगणना के Online Portal पर जाना होता है। ये Portal है se.census.gov.in इस Portal पर जाकर आप अपने Mobile Number से Login कीजिए, अपना स्थान दर्ज कीजिए, अपने परिवार से जुड़ी जानकारी भरिए, और उसे Submit कर दीजिए। इस पूरी प्रक्रिया में करीब 15 से 20 मिनट का समय लगता है। इसके लिए आपको कोई Document भी Upload नहीं करना है। जानकारी Submit करने के बाद आपको एक विशेष ID मिलेगी। जब गणनाकर्मी आपके घर आएं, तो आप उन्हें ये ID बता सकते हैं। आपके द्वारा दी गई जानकारी की पुष्टि होने के बाद वो जनगणना का हिस्सा बन जाएगी। साथियो, अब तक Mobile से 2 करोड़ 60 लाख से ज्यादा लोग जनगणना पोर्टल पर अपनी जानकारी भर चुके हैं, स्व-गणना कर चुके हैं। आपका भी इसमें थोड़ा सा समय खर्च होगा, लेकिन देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आपकी सही जानकारी, आपके परिवार की सही जानकारी, देश के भविष्य की सही तस्वीर तैयार करने में मदद करती है।

मेरे प्यारे देशवासियो,

आज 27 सितंबर की ये तारीख एक विशेष कारण से और भी विशेष हो गयी है। आज एक ऐसे महानुभाव की 100वीं जन्मजयंती है जिन्होंने संस्कृति, समाज और राष्ट्र के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। मैं बात कर रहा हूँ, ‘विश्व हिन्दू परिषद’ के पूर्व अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष श्रद्धेय स्वर्गीय अशोक सिंहल जी की। 27 सितंबर 1926 को आज के ही दिन आगरा में उनका जन्म हुआ था। उन्होंने समाज में रहकर तपस्वियों जैसा जीवन जिया। उन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन को जो दिशा दी, जो ऊर्जा दी, आज उसी का परिणाम है कि हम अयोध्या में भव्य मंदिर को साक्षात देख रहे हैं। मेरा तो बहुत बड़ा सौभाग्य रहा है। मैंने, न केवल उनके उस जीवन को करीब से देखा, बल्कि, मुझे उनके साथ इस मिशन से जुड़ने का भी अवसर मिला। जब मैं राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के अनुष्ठान में शामिल हो रहा था तब भी मुझे बार-बार अशोक जी की याद आना बहुत स्वाभाविक था।

साथियो,

अशोक जी के बारे में ऐसी कितनी ही बातें हैं, जिनकी उतनी चर्चा नहीं होती। राम मंदिर आंदोलन के साथ ही उन्होंने सामाजिक भेदभाव और विषमता के खिलाफ भी एक बड़ी लड़ाई लड़ी थी। उनका जन्म एक बेहद समृद्ध परिवार में हुआ था। उनके पिता एक सिविल सेवा अधिकारी थे। उनके भाई-बहनों में भी अधिकांश लोग बड़े बड़े पदों पर रहे। वे खुद भी IIT BHU से ग्रेजुएट थे। लेकिन, इस सबके बावजूद उन्होंने समाज और संस्कृति के लिए अपना जीवन समर्पित किया यही महान लोगों की पहचान होती है। आज मैं उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर उनके करोड़ों प्रशंसकों की ओर से उन्हें नमन करता हूँ। मेरी तरफ से भावपूर्ण श्रद्धांजलि देता हूँ।

मेरे प्यारे देशवासियो,

इस साल की शुरुआत हमने स्वाभिमान के एक महापर्व के साथ की थी। ये पर्व था “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” आज से एक हजार साल पहले, 1026 में मोहम्मद गजनी ने पहली बार सोमनाथ मंदिर को विध्वंस किया था। लेकिन, जो लोग सोमनाथ को तोड़कर भारत की पहचान मिटाने आए थे, आज, उनका कोई वजूद भी नहीं है, और सोमनाथ मंदिर, पूरी भव्यता के साथ विशाल समुद्र के किनारे भारत को अमरता का आशीर्वाद दे रहा है। इसीलिए हमने पूरे गर्व के साथ इस साल ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मनाया।

साथियो,

ये चर्चा मैं आज ‘मन की बात’ में फिर से क्यों कर रहा हूँ – इसकी भी एक खास वजह है। 1026 ईसवी में जब गजनी द्वारा सोमनाथ विध्वंस हुआ था। उसी साल गुजरात के ही मोढेरा में प्रसिद्ध सूर्य मंदिर पर भी हमला हुआ था, उसे तोड़ा गया था। यानि मोढेरा मंदिर विध्वंश को भी इस साल एक हजार साल हुए हैं, जबकि उस समय, इस मंदिर को बने सिर्फ एक ही साल हुआ था। 1025 में इस मंदिर का निर्माण राजा भीमदेव ने कराया था।

साथियो,

आप उस कालखंड के बारे में सोचिए जब इतना बड़ा आक्रमण हुआ हो, सोमनाथ मंदिर जैसा आस्था का इतना बड़ा केंद्र खंडित किया गया हो और कई जगहों पर भी हमले हुए हों तो किसी भी समाज या शासन का मनोबल टूट सकता था। लेकिन, राजा भीमदेव प्रथम ने न केवल गजनी का मुकाबला किया था बल्कि, कुछ ही समय में मोढेरा सूर्यमंदिर का पुनर्निर्माण भी करवा दिया। इसी जीवटता के कारण सोमनाथ मंदिर का भी बार-बार विध्वंस के बावजूद पुनर्निर्माण होता रहा।

साथियो,

मोढेरा सूर्य मंदिर पर भी बाद के कालखंड में हमले रुके नहीं। बाद में अलाउ‌द्दीन खिलजी ने एक बार फिर वास्तुकला के इस भव्य मंदिर को तोड़ दिया था, लेकिन साथियो, हम भारत के लोग सूर्य  की उपासना केवल वास्तु और मंदिरों के जरिए ही नहीं करते, हमारी सूर्य उपासना, उसका एक अर्थ ये भी होता है प्रकाश, ऊर्जा, विज्ञान और निरंतरता की प्रेरणा। इसीलिए, मोढेरा भी आज ना केवल सूर्य मंदिर के लिए जाना जाता है, बल्कि गुजरात का ये गांव देश का प्रथम सूर्य ग्राम, solar village विलिज बन चुका है, मोढेरा आज पूरी तरह सौर ऊर्जा से चलता है, और उसने देश के सामने sustainability का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। मोढेरा में पर्यटकों के लिए कई आकर्षण और सुविधाओं की शुरुआत भी हुई है। जनवरी में मकर सक्रांति के बाद वहां मोढेरा नृत्य महोत्सव का आयोजन भी होता है। इसमें भारत के सांस्कृतिक और शास्त्रीय नृत्यों की अद्भुत प्रस्तुति होती है। मैं चाहूँगा, आप सब भी एक बार मोढेरा अवश्य जाएँ और भारत की इस गौरवशाली विरासत के दर्शन करें।

साथियो,

अतीत से हमारा जुड़ाव आज भी बहुत जीवंत है। इसके पीछे उन लोगों का समर्पण और परिश्रम है, जो इसे और गहरा बना रहे हैं। तमिलनाडु में तिरुचिरापल्ली के मनप्पारई में ऐसा ही एक अनूठा प्रयास हो रहा है। एक college में Department of Tamil Studies से जुड़े ए. सेल्वाराजू जी इसे आगे बढ़ा रहे हैं। एक lecture के दौरान उन्हें अपने एक student से कुछ प्राचीन प्रतिमाओं की जानकारी मिली थी। इस विषय पर चर्चा के बाद उन्होंने field visit का plan बनाया। इस visit के दौरान उन्हें अलग-अलग जगहों पर कई प्रतिमाएं मिलीं और प्राचीन मंदिर मिले। अतीत से जुडने का यह एक रोचक प्रयास है। इस प्रकार हम अपनी विरासत को और बेहतर तरीके से जान सकते हैं। देश के दूसरे हिस्सों में भी ऐसे प्रयास किए जा सकते हैं। ये हमें अपने इतिहास को करीब से देखने और समझने का अवसर देते हैं।

मेरे प्यारे देशवासियो,

कुछ ही दिनों बाद 2 October है – पूज्य बापू की जयंती का दिन। बापू ने हमें जीवन के बहुत से मंत्र दिए हैं। स्वच्छता भी उनमें से एक है। हम अक्सर अपने आसपास स्वच्छता से जुड़े अनेक प्रयासों को देखते हैं। ये प्रयास बहुत प्रेरक और उत्साह बढ़ाने वाले हैं। Social Media पर भी ऐसी तस्वीरें, ऐसे वीडियो, ऐसी reels बार-बार हमारा ध्यान खींचती हैं। हाल के दिनों में मैंने ऐसे कई प्रयास देखे हैं। कहीं मध्य प्रदेश में कुछ नौजवान नदी की सफाई का काम कर रहे हैं। उनके छोटे से प्रयास में पूरा समाज जुड़ रहा है। ऐसे ही, आंध्र प्रदेश में, युवा, पुरानी बावड़ियों और कुओं की सफाई कर रहे हैं। इससे हमारी पुरानी धरोहरों, उसे फिर से सँवारने का काम हो रहा है। मुंबई में कुछ युवा समुद्र तटों को साफ रखने की पहल कर रहे हैं। हर हफ्ते किसी-न-किसी beach पर सैकड़ों युवा-साथी इकट्ठा हो रहे हैं, स्वच्छता से सेवा कर रहे हैं। यहां दिल्ली में बच्चे और युवा, लोगों को कचरा अलग-अलग रखने और अपने आसपास सफाई रखने के लिए जागरूक कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में युवा छात्रों और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर picnic स्थलों पर बाजारों की सफाई कर रहे हैं।

साथियो,

इन सभी प्रयासों में एक बात बहुत सहजता से दिखाई देती है। कहीं शुरुआत एक व्यक्ति ने की, फिर उसके साथ कुछ और लोग आ गए, कारवां बढ़ता गया – यही तो जनभागीदारी है। बापू के प्रति हमारी सबसे सुंदर श्रद्धांजलि भी स्वच्छता ही है।

मेरे प्यारे देशवासियो,

हम पर्यावरण की रक्षा करते हैं, तो हम केवल पेड़–पौधों या जीव–जंतुओं को ही नहीं बचाते, हम उस पूरी जीवन- व्यवस्था को मजबूत करते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे कुछ प्रयास इस भावना को बहुत सुंदर तरीके से सामने ला रहे हैं।

साथियो,

असम में सोनाई रुपाई Wildlife Sanctuary है। एक समय था जब यहां हाथियों का बसेरा हुआ करता था, लेकिन, धीरे-धीरे जंगल की जमीन पर इंसानी दखल बढ़ता गया, जिससे, हाथियों ने इस इलाके से दूरी बना ली। तीन साल पहले इस जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया, और अब, इसके अद्भुत परिणाम सामने आए हैं। हाथी यहाँ फिर लौट आए हैं। जिस इलाके में बरसों से उनकी चहल-पहल नहीं थी, आज वहाँ फिर हाथियों के झुंड दिखाई दे रहे हैं।

साथियो,

असम में ही एक और सुंदर प्रयास हुआ है। ये प्रयास एक बहुत छोटे से जीव, Pygmy Hog को बचाने का है। एक समय इसके अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा था, तब, केवल 6 Pygmy Hog के साथ एक Conservation Program शुरू किया गया, उन्हें, फिर, जंगलों में बसाया गया। उनके रहने के लिए Grasslands को भी संवारा गया। आज इस Program की वजह से Pygmy Hog की संख्या 190 से ज्यादा हो चुकी है।

साथियो,

प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता सिर्फ उसे सहेजने तक सीमित नहीं है। कई बार हम प्रकृति को संभालते हैं, तो वही प्रकृति, हमारे जीवन का सहारा बन जाती है। पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में कुछ महिलाएं इसी रिश्ते की प्रेरक मिसाल पेश कर रही हैं। झारखाली की ये महिलाएं Mangrove के जंगल तैयार कर रही हैं। इनमें से ज्यादातर वो महिलाएं हैं, जिनके पति की टाइगर Attack में जान चली गई थी। पति को खोने के बाद उन्हें सुंदरबन से ही आजीविका का सहारा मिला। उनके द्वारा लगाए गए Mangrove आज गाँवों के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा-कवच बन रहे हैं, और इन्हें लगाकर, इन महिलाओं की कमाई भी हो रही है। साथियो, हम पर्यावरण को सहेजें, प्रकृति के संतुलन का सम्मान करें, और, उसकी विविधता को सुरक्षित रखें। हमारा हर ऐसा प्रयास भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।

मेरे प्यारे देशवासियो,

हाल ही में देश के लाखों युवाओं ने नशे के विरुद्ध, drugs के खिलाफ, एक बहुत महत्वपूर्ण संकल्प लिया है। युवाओं ने खुद भी नशे से दूर रहने की प्रतिज्ञा ली है, और, इस संदेश को दूसरों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी ली है – ये सब हो रहा है ‘नशा मुक्त युवा अभियान’ के तहत। ये अभियान 100 सप्ताह तक चलेगा। इसमें MY Bharat के Volunteers शामिल हैं। NSS से जुड़े हमारे युवा भी इसका हिस्सा है, School-College और विश्वविद्यालय भी साथ आए हैं, और अनेक सामाजिक और आध्यात्मिक संस्थाएं भी इससे जुड़ी हैं। पिछले कुछ दिनों में ही देशभर में हजारों संकल्प समारोह और जागरुकता के कार्यक्रम हुए हैं।

साथियो,

इस अभियान में एक बात मुझे विशेष रूप से अच्छी लगी ‘नशा मुक्ति का संदेश’। हमारे युवा खुद अपनी भाषा में, अपने तरीके से इस संदेश को आगे बढ़ा रहे हैं। मैंने ‘मन की बात’ में भी युवा साथियों से आग्रह किया था कि वे अपनी Creativity के माध्यम से इस अभियान से जुड़ें, और मुझे खुशी है कि हजारों युवा इस आह्वान पर आगे आए हैं। MY Bharat पर Anthem, Slogan Writing  और नुक्कड़ नाटक जैसी अलग–अलग प्रतियोगिताएँ हुई हैं। इसी तरह, Social Media पर हमारे युवा ‘# नशा मुक्त युवा’ के साथ अपना Creative Content साझा कर रहे हैं, यानि, संदेश भी युवाओं का है, माध्यम भी युवाओं का है और इसे आगे ले जाने की ऊर्जा भी युवाओं की ही है। आने वाले दिनों में इस अभियान के तहत Health Check–Up और ध्यान शिविर जैसी गतिविधियां भी होंगी।

साथियो,

जल्द ही, हमारे अनेक पर्व और त्योहार भी आने वाले हैं। इस बार त्योहारों की खुशियों के बीच हम अपने आसपास भी नजर डालें। अगर कोई युवा किसी गलत आदत की ओर बढ़ रहा है, तो उससे बात करें। अगर कोई नशे से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है, तो उसका साथ दें। नशा मुक्त युवा विकसित भारत के इस संकल्प को हम सब मिलकर आगे बढ़ाएं।

मेरे प्यारे देशवासियो,

लाल किले से मैंने इस बार sports के लिए talent hunt अभियान का ऐलान किया है। भारत लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करता रहे, इसके लिए गाँव और कस्बों तक पहुँचकर sporting talent को खोजना जरूरी है। वहीं, कई ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने इसी काम के लिए खुद को समर्पित कर दिया है। उनका एक ही passion होता है talent को खोजना और उन्हें तराशना। हमारे पंजाब में यही काम राजिंदर सिंह जी कर रहे हैं। राजिंदर सिंह जी ऐसे एक व्यक्ति हैं जिनके नाम में Senior भी जुड़ा हुआ है। वे 1980 के Olympic में hockey में Gold Medal जीतने वाली team का हिस्सा थे। 1982 के World Cup में छाए रहे थे। 2001 में भारत ने पहली बार Men’s Junior World Cup का खिताब जीता था। वहीं, 2003 में देश ने Senior Asia Cup title पर कब्जा किया था। इन दोनों ही tournament में वे coach की भूमिका में थे। अब वे Round Glass Hockey Academy के जरिए अपने passion को आगे ले जा रहे हैं। उनके प्रयासों से गाँवों में नई hockey astro-turf बिछाई जा रही है। राजिंदर जी का focus एकदम clear है। ऐसे गाँवों में बच्चों की पहचान करना, जहां बेहतरीन coaching की सुविधाएं कम हैं। ऐसे प्रयासों से कई खिलाड़ी भारत के junior और senior level पर अपनी जगह बना रहे हैं। राजिंदर सिंह जी के इस समर्पण की जितनी भी सराहना की जाए वो कम है।

मेरे प्यारे देशवासियो,

आंवला हम सभी के लिए बहुत जाना-पहचाना है। ज्यादातर घरों में इससे बने आचार और मुरब्बे का प्रयोग होता है। बहुत से लोग आंवले का juice पसंद करते हैं और सर्दियों में च्यवनप्राश हमारी दिनचर्या का अहम हिस्सा बन जाता है। हमारे बड़े-बुजुर्ग तो पीढ़ियों से आंवले के गुणों के बारे में बताते आए हैं।

साथियो,

यही आंवला आज उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में नई संभावनाओं का माध्यम बन रहा है। प्रतापगढ़ और आंवले का रिश्ता बहुत पुराना है। पीढ़ियों से यहां के किसान आंवले की खेती कर रहे हैं। आंवले ने प्रतापगढ़ को एक मजबूत पहचान दी है और अब यही पुरानी पहचान यहां के किसानों और महिलाओं के लिए नए अवसर लेकर आ रही है। One District One Product यानी ODOP के माध्यम से यहां आंवले से जुड़े स्थानीय उद्यमों को बढ़ावा मिला है। आज प्रतापगढ़ में आंवला processing से जुड़ी करीब 100 unit काम कर रही हैं, और इसमें self help groups से जुड़ी महिलाएं भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं। ऐसा ही एक समूह है – देवगढ़ कमासी गांव का। सावित्री फुले self help group इससे जुड़ी महिलाएं आंवले से candy, मुरब्बा और juice बना रही हैं। ODOP के तहत नए बाजारों तक पहुँच बढ़ने से उनकी आय में भी बढ़ोत्तरी हुई है। इसी तरह एक गांव में विंध्यवासिनी Self Help Group है। इस group की महिलाएं आंवले का आचार, digestive powder ऐसी कई चीजें तैयार कर रही हैं। इन महिलाओं को processing के लिए machinery मिली, loan की सुविधा मिली। स्थानीय व्यापार मेले से जुड़ने का अवसर भी मिला और देखते-ही-देखते उनकी आय काफी बढ़ गई।

साथियो,

हमारे देश के हर क्षेत्र में ऐसी कोई-ना-कोई विशेषता जरूर है।  कहीं कोई खास फल है, कहीं कोई पारंपरिक कला है, तो कहीं कोई अनोखा हुनर है। One District One Product इन्हीं विशेषताओं को आगे बढ़ाने का अभियान है। हमारा प्रयास यही होना चाहिए कि हमारे गाँव और छोटे शहरों की ये पहचान सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित ना रहे। वे देश और दूसरे हिस्सों तक पहुंचे और दुनिया के बाजारों तक भी पहुंचे। इससे Vocal for Local अभियान को भी बल मिलता है। ये देश को आत्मनिर्भर बनाने की भी प्रेरणा देता है। आने वाले त्योहारों में भी हमें Vocal for Local वाले मंत्र को तो कभी भी भूलना नहीं है।

मेरे प्यारे देशवासियो,

सितंबर का ये महीना कुपोषण से लड़ाई को समर्पित है। पोषण माह में अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोग और संस्थाएं इस नेक कार्य के लिए एक साथ आती हैं। कुपोषण से मुकाबला करने के लिए इस साल कई सराहनीय पहल की गई हैं। छतीसगढ़ ने ‘हर घर मुनगा-घर-घर मुनगा’ यह अभियान शुरू किया है। इसमें लोगों को पौष्टिक मुनगा यानि मोरिंगा को अपने खान-पान में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। गुजरात ने भी वांगी स्पर्धा यानि millets से बने व्यंजनों का competition शुरू किया है। इस पहल के जरिए सस्ते और पौष्टिक स्थानीय खान-पान को बढ़ावा दिया जा रहा है। अब तक दो लाख से ज्यादा लोग इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले चुके हैं। महाराष्ट्र भी इस दिशा में सराहनीय प्रयास कर रहा है। वहाँ teachers, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और बच्चों के माता-पिता जागरूकता अभियान से जुड़ रहे हैं। मिजोरम में भी, इस साल लोगों ने साथ मिलकर पोषण वाटिकाओं की देखभाल के लिए एक अभियान शुरू किया है। यह मिजो समाज के ‘तलो–मड़–यना’ की परंपरा के अनुरूप है। इसका अर्थ है ‘निस्वार्थ सेवा और दूसरों की मदद में हमेशा आगे रहना’। ऐसे प्रयास बेहद सराहनीय हैं। मुझे आंगनवाड़ी केंद्रों से जुड़े उन सभी लोगों पर भी गर्व है जो इस तरह की पहल का हिस्सा रहे हैं। ये आंगनवाड़ी केंद्र अब ‘पोषण tracker’ से digitally जुड़ गए हैं। करीब 9 करोड़ लाभार्थी इसमें registered हो चुके हैं। इससे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की बेहतर देखभाल संभव हुई है। हमें कुपोषण के खिलाफ इस लड़ाई को इसी तरह आगे लेकर जाना है। हमें हमारे समाज को कुपोषण से पूरी तरफ मुक्त करना है।

साथियो,

हम सबने इस महीने पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ गणेश उत्सव मनाया है। देशभर में पूरे भक्तिभाव से गणपति बाप्पा का स्वागत किया गया। यह पावन अवसर पूरे वातावरण को उमंग और उल्लास से भर देता है।

साथियो,

विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश ज्ञान, बुद्धि और शुभ कार्यों के आरंभ के प्रतीक हैं। उनके प्रति अगाध श्रद्धा सिर्फ भारत में ही नहीं है, जैसे, श्रीमान पंथौन थीरखानोन जी, उन्हीं की बात ले लीजिए, वे वैसे तो Thailand के हैं। यहाँ भगवान श्री गणेश की पूजा ‘फ्रा फिकानेत’ के रूप में की जाती है। और जब वे 19 वर्ष के थे, तब उनके पिता ने उन्हें भगवान श्री गणेश की एक फोटो भेंट की थी। यहीं से उनमें अद्भुत भक्ति जागृत हुई। वे भगवान श्री गणेश से जुड़ी परंपराओं के अध्ययन में चार दशक से भी अधिक समय बिता चुके हैं। उन्होंने भारत और नेपाल सहित एशिया के कई देशों की यात्रा की है। महाराष्ट्र से उनका विशेष लगाव रहा है। अष्टविनायक परंपरा के बारे में जानने के बाद वे कई बार यहाँ आ चुके हैं। उनके प्रयासों से Thailand के श्रद्धालुओं के बीच भी अष्टविनायक यात्रा लोकप्रिय हो चुकी है। वर्ष 2002 में उन्होंने उत्तरी Thailand के चियांग माई में गणेश हिमाल म्यूजियम की स्थापना की। आज इसमें 10 हजार से अधिक गणेश प्रतिमाएं हैं। म्यूजियम में उन भक्तों के लिए अष्टविनायक की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं, जो भारत नहीं आ सकते। यहाँ हर रविवार सुबह करीब 10 बजे गणेश जी की पूजा-अर्चना की जाती है। गणपति से जुड़े विशेष अवसरों पर भी अनुष्ठान होते हैं। यह बताता है कि भारत की आस्था, कला और सांस्कृतिक परम्पराएं दूसरे देशों में भी कैसे लोकप्रिय हो रही हैं। मेरी कामना है, गणपति बप्पा का आशीर्वाद सभी पर हमेशा बना रहे।           

साथियो,

‘मन की बात’ के हर episode के बाद मुझे अनेक विषयों पर आपके संदेश मिलते रहते हैं। आप इसी तरह, प्रेरणा से भरी गाथाएं भेजते रहिए। जब आप अपने आस-पास हो रहे ऐसे प्रयासों की सराहना करते हैं, तो उनका उत्साह और बढ़ जाता है। ‘मन की बात’ के माध्यम से उनके में बारे जानकार देश के दूसरे हिस्सों के लोग भी प्रेरित होते हैं। ये यात्रा इसी तरह आपके सहयोग से निरंतर आगे बढ़ती रहे। आने वाले त्योहारों को, आप, अपने परिजनों और दोस्तों के साथ पूरे आनंद और उल्लास से मनाएं। मैं आप सभी को एक बार फिर शुभकामनाएं देता हूँ।

बहुत-बहुत धन्यवाद।

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