अप्रैल 24, 2026

आयुष डिप्लोमेसी आर्कटिक पहुंची: भारत रेक्जाविक सभा में एकीकृत स्वास्थ्य सहयोग का समर्थक

आयुष अनुसंधान और कल्याण सहयोग आर्कटिक सर्कल असेंबली-2025 में गूंजेगा

भारतीय प्रतिनिधिमंडल में, केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) के महानिदेशक प्रोफेसर (वैद्य) रबीनारायण आचार्य और आयुष मंत्रालय के संयुक्त सलाहकार (होम्योपैथी) डॉ. श्रीनिवास राव चिंता ने आइसलैंड के रेक्जाविक में आयोजित आर्कटिक सर्कल असेंबली-2025 में भाग लिया।

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“आर्कटिक में ग्लोबल साउथ की भूमिका और महत्व” शीर्षक वाले पूर्ण सत्र के दौरान प्रो. आचार्य ने अपनी व्यापक आर्कटिक नीति के अंतर्गत आर्कटिक क्षेत्र में भारत की सक्रिय भागीदारी पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की बढ़ती प्रासंगिकता और आर्कटिक जैसे चरम इकोसिस्टम में भी स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में आयुष हस्तक्षेपों की क्षमता पर प्रकाश डाला।

इस सत्र का आयोजन भारत सरकार द्वारा किया गया था और इसमें भारत सरकार के पोलर कॉडिनेटर रियर एडमिरल टीवीएन प्रसन्ना, राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र (एनसीपीओआर) के वैज्ञानिक-एफ मनीष तिवारी तथा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अमीरात ध्रुवीय कार्यक्रम के संचालन समिति सदस्य वसीम सईद सहित कई प्रतिष्ठित वक्ताओं ने भाग लिया।

प्रो. आचार्य ने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और आर्कटिक अनुसंधान के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए एक दूरदर्शी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने आर्कटिक परिवेश में बहु-विषयक अवधारणा-सिद्धांत नैदानिक ​​परीक्षणों की शुरुआत, आर्कटिक नीति संरचना के अंतर्गत एक संयुक्त अनुसंधान संघ की स्थापना, और अंतर-सांस्कृतिक आयुष वितरण एवं सुरक्षा निगरानी में क्षमता विकास का प्रस्ताव रखा। उन्होंने पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा के बीच सेतु बनाने के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण प्रकाशित करने की आवश्यकता पर बल दिया और भारत की आर्कटिक आउटरीच डिप्लोमेसी में आयुष जागरूकता को शामिल करने की वकालत की।

आयुष मंत्रालय के प्रतिनिधिमंडल की भागीदारी, वैश्विक स्थिरता और स्वास्थ्य संवादों में आयुष-आधारित साक्ष्य, नवाचार और कूटनीति को एकीकृत करने की भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। यह भागीदारी आर्कटिक नीति ढांचे के अंतर्गत समग्र स्वास्थ्य, वैज्ञानिक सहयोग और लोगों के बीच साझेदारी को बढ़ावा देने वाले एक ज़िम्मेदार हितधारक के रूप में भारत की स्थिति की पुष्टि करती है।

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