पृथ्वी विज्ञान सचिव डॉ. एम. रविचंद्रन ने महासागर कानून एवं नीति पर 48वें वार्षिक सम्मेलन में हिंद महासागर के सामरिक महत्व, अवसरों और चुनौतियों का उल्लेख किया
नई दिल्ली में आयोजित सीओएलपी48 में, उन्होंने वैश्विक शासन में हिंद महासागर के रणनीतिक महत्व पर जोर दिया
भारत ने लगभग 50 वर्षों में पहली बार सीओएलपी48 की मेजबानी की, महासागर शासन में उसकी भूमिका मजबूत हुई

महासागर कानून एवं नीति पर 48वें वार्षिक सम्मेलन – सीओएलपी48 को आज पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय सचिव डॉ. एम. रविचंद्रन ने मुख्य रूप से संबोधित किया। “महासागरीय शासन के प्रति विकासशील विश्व के दृष्टिकोण: हिंद महासागर क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य” विषय पर आयोजित सम्मेलन में वैश्विक पक्षधारक सागर सीमावर्ती राष्ट्रों की विकासात्मक प्राथमिकताओं पर आधारित संवहनीय और समावेशी समुद्री शासन के उपाय पर विचार के लिए एकत्रित हुए।
सीओएलपी के करीब पांच दशक के इतिहास में पहली बार इस सम्मेलन का आयोजन भारतीय उपमहाद्वीप में हो रहा है, जो वैश्विक महासागर शासन को आकार देने में भारत की भूमिका के लिए महत्वपूर्ण है।
सम्मेलन में शामिल गणमान्य प्रतिनिधियों, विद्वानों, नीति निर्माताओं और पेशेवरों को संबोधित करते हुए, डॉ. रविचंद्रन ने कहा कि पृथ्वी के लिए हिंद महासागर का अद्वितीय महत्व है। उन्होंने कहा कि महासागर जलवायु को नियंत्रित करता है, जैव विविधता को सहारा देता है, आजीविका के साधन बनाए रखता है और वैश्विक व्यापार तथा सुरक्षा में केंद्रीय भूमिका निभाता है। हालांकि, उन्होंने यह भी आगाह किया कि इस क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम, समुद्र के स्तर में वृद्धि, अम्लता, घटती उत्पादकता और चक्रवाती तूफानों के बढ़ते खतरों का सामना करना पड़ रहा है।
डॉ. रविचंद्रन ने विकासशील विश्व के परिप्रेक्ष्य में महासागर प्रशासन के लिए पांच प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को रेखांकित किया, जिनमें:
- संवहनीय मत्स्य पालन और समुद्री कृषि द्वारा आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के बीच विकासशील देशों की एकजुटता पर आधारित क्षेत्रीय सहयोग सुदृढ़ करना।
- पारंपरिक ज्ञान तथा सहभागी शासन को आधुनिक विज्ञान के साथ समेकित करना।
- जैव विविधता सुरक्षित रखने के लिए जलवायु स्थितिअनुकूलता और पारिस्थितिकी तंत्र आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा देना।
- महासागर अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और प्रशासन के लिए अभिनव वित्तीय व्यवस्था करना और क्षमता निर्माण, शामिल हैं।
पृथ्वी विज्ञान सचिव ने जोर देकर कहा कि इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संधारणीय और समावेशी सामुद्रिक अर्थव्यवस्था को आकार देने और मजबूत अधिनियमों, नीतियों और सामूहिक दायित्व की आवश्यकता है।
डॉ. रविचंद्रन ने समुद्री स्थानिक नियोजन, जोखिम न्यूनीकरण ढांचे और स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया, जो अभिनव वित्तीय व्यवस्था और प्रौद्योगिकी-संचालित समाधानों द्वारा समर्थित हो, ताकि नवीकरणीय समुद्री ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज पदार्थों और पारिस्थितिकी-पर्यटन जैसे संसाधनों का समुचित और संवहनीय उपयोग किया जा सके।
पृथ्वी विज्ञान सचिव ने कहा कि पृथ्वी की सतह का 70 प्रतिशत हिस्सा समुद्री होने के बाद भी केवल 5 प्रतिशत महासागरों का ही पूरी तरह अन्वेषण हो सका है। उन्होंने इसके लिए उन्नत अनुसंधान, अवलोकन नेटवर्क प्रणाली और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की अविलंब आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. रविचंद्रन ने संयुक्त राष्ट्र के समुद्री विनियामक तंत्र – यूएनसीएलओएस, अंतर्राष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण और सागर संधि – बीबीएनजे समझौते के अंतर्गत वैश्विक शासन मंचों में हिंद महासागर के देशों की अधिक भागीदारी का भी आह्वान किया।
उन्होंने हिंद महासागर की विशिष्टता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दुनिया का इकलौता ऐसा महासागर है जहां धाराएं और हवाएं हर छह महीने में अपनी दिशा बदल लेती हैं और इसका ऊर्ध्वतर निकास नहीं है, जिससे ऊष्मा संचित होता है और तेज़ी से गर्मी बढ़ती है। उन्होंने आगाह किया कि इस क्षेत्र में समुद्री ताप लहर दिवसों की संख्या मौजूदा प्रति वर्ष 20 दिनों से बढ़कर सदी के अंत तक 220 दिन प्रति वर्ष पहुंच सकती है, जिससे प्रवाल भित्तियों, मछली पकड़ने और तटीय आजीविका को खतरा उत्पन्न हो सकता है।
डॉ. रविचंद्रन ने ज़ोर देकर कहा कि हिंद महासागर खाद्य, जल, ऊर्जा, जलवायु और सुरक्षा के संदर्भ में भारत का भविष्य है, इसलिए इस पर नीतियां साक्ष्य-आधारित, सहयोगात्मक और दूरदर्शी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक स्वच्छ, स्वस्थ, स्थितिअनुकूल और उत्पादक हिंद महासागर क्षेत्रीय प्राथमिकता ही नहीं, वैश्विक आवश्यकता भी है। उन्होंने कहा कि इसके लिए सहयोग महत्वपूर्ण है, ताकि आने वाली पीढ़ियों का महासागर पोषण करता रहे।
सम्मेलन का आयोजन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सहयोग से स्टॉकटन सेंटर फॉर इंटरनेशनल लॉ, यूएस नेवल वॉर कॉलेज और गुजरात मैरीटाइम यूनिवर्सिटी ने किया। इसमें विश्व मैरीटाइम यूनिवर्सिटी, कोरिया मैरीटाइम इंस्टीट्यूट, जापान इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स, नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन, कोपेनहेगन विश्वविद्यालय और आईएमओ इंटरनेशनल मैरीटाइम लॉ इंस्टीट्यूट सहित कई प्रतिष्ठित वैश्विक संस्थान भाग ले रहे हैं।