मार्च 10, 2026

भारत के मध्यस्थता भविष्य का निर्माण: भारत मंडपम में “संस्थागत मध्यस्थता: विवाद समाधान के लिए एक प्रभावी ढांचा” विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित

“भारत मध्यस्थता का केंद्र बनेगा”: केंद्रीय विधि एवं न्याय तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल

वैश्विक मध्यस्थता केंद्र के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत करने के लिए, विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधिक मामलों के विभाग द्वारा ओएनजीसी और भारत अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र (आईआईएसी) के सहयोग से 14 जून, 2025 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में संस्थागत मध्यस्थता (आर्बीट्रेशन) पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। एक दिवसीय सम्मेलन में विधि एवं न्याय मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) के प्रतिनिधि, कानूनी विशेषज्ञ और मध्यस्थता पेशेवर शामिल हुए। इसका उद्देश्य वाणिज्यिक विवाद समाधान के पसंदीदा तरीके के रूप में संस्थागत मध्यस्थता को बढ़ावा देना और आईआईएसी को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी मध्यस्थता संस्थान के रूप में रेखांकित करना था।

केंद्रीय विधि एवं न्याय तथा संसदीय मामलों के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। अपने संबोधन में उन्होंने भारत की आधुनिक कानूनी आकांक्षाओं को इसके दार्शनिक इतिहास से जोड़ा, सहमति से विवाद समाधान की देश की प्राचीन परंपरा का उल्लेख किया और कहा कि मध्यस्थता भारतीय संस्कृति में गहराई से निहित है। सरकार के विजन की दृढ़ता से पुष्टि करते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘भारत मध्यस्थता का केंद्र बनेगा।’’

उद्घाटन सत्र की शुरुआत आईआईएसी के अध्यक्ष माननीय न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता (सेवानिवृत्त) के स्वागत भाषण से हुई, जिन्होंने भारत में संस्थागत मध्यस्थता के विकास में बाधा डालने वाली प्रमुख चुनौतियों, विशेष रूप से तदर्थ तंत्रों पर निरंतर निर्भरता की चर्चा की। उन्होंने सरकार द्वारा उठाए गए एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय वैकल्पिक विवाद समाधान केंद्र (आईसीएडीआर) से आईआईएसी में परिवर्तन पर जोर दिया और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) द्वारा संरचित संस्थागत ढांचे को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके बाद विधिक मामलों के विभाग के निदेशक श्री अवनीत सिंह अरोड़ा ने पिछले दशक में विभाग द्वारा किए गए विधायी कदमों और नीति सुधारों को रेखांकित करते हुए एक विस्तृत प्रस्तुति दी।

ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन लिमिटेड (ओएनजीसी) के अध्यक्ष श्री अरुण कुमार सिंह ने उद्योग के दृष्टिकोण को सामने रखते हुए त्वरित, संस्थागत मध्यस्थता प्रक्रियाओं का आह्वान किया। उन्होंने कहा, ‘‘हमारी कानूनी प्रणालियों का चरित्र समयबद्धता होनी चाहिए, असमयानुकूलता नहीं।’’ सार्वजनिक उद्यम विभाग के सचिव श्री के मोसेस चालई ने भी इस विचार को दोहराया और रेखांकित किया कि प्रभावी मध्यस्थता सीधे तौर पर सीपीएसई के शासन, प्रचालनगत दक्षता और आर्थिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधिक मामलों के विभाग की सचिव डॉ. अंजू राठी राणा ने कानूनी सुधारों – अप्रचलित कानूनों को निरस्त करने से लेकर न्यायालय प्रणाली को डिजिटल बनाने तक का विस्तृत विवरण दिया। उन्होंने विशेष रूप से पीएसयू अनुबंधों में विवाद समाधान खंड शामिल करके आईआईएसी को विश्व स्तरीय मध्यस्थता संस्थान के रूप में विकसित करने के सरकार के विजन पर जोर दिया, जो आईआईएसी को मध्यस्थता की पसंदीदा संस्था के रूप में नामित करता है और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्रों के बराबर हो।

केंद्रीय विधि एवं न्याय तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री अर्जुन राम मेघवाल ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में संस्थागत मध्यस्थता: विवाद समाधान के लिए एक प्रभावी ढांचा विषय पर आयोजित सम्मेलन की अध्यक्षता की

उद्घाटन सत्र के बाद, सम्मेलन में चार तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें से प्रत्येक में संस्थागत मध्यस्थता के प्रमुख पहलुओं पर गहन चर्चा की गई। 150 से अधिक प्रतिष्ठित प्रतिनिधियों की भागीदारी के अतिरिक्त, सम्मेलन में फेसबुक पर 700 से अधिक बार और यूट्यूब पर 900 से अधिक बार लाइव देखे जाने के साथ मजबूत वर्चुअल जुड़ाव देखा गया।

पहले सत्र, ‘‘पीएसयू में विवाद समाधान का सुदृढ़ीकरण: संस्थागत मध्यस्थता की भूमिका’’, में सार्वजनिक क्षेत्र-विशिष्ट चुनौतियों और विवाद समाधान परिदृश्य को बदलने में संस्थागत मध्यस्थता की, विशेष रूप से बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक क्षेत्र के अनुबंधों से संबंधित क्षमताओं पर ध्यान दिया गया। वक्ताओं ने क्षमता निर्माण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला और आईआईएसी जैसे निकायों के समर्थन से खंडित तदर्थ तंत्रों की तुलना में संरचित, संस्थागत प्रक्रियाओं की अपील की। दूसरे सत्र में आईआईएसी (मध्यस्थता का संचालन) विनियम, 2023 पर सूक्ष्मता से विचार किया गया, जिसमें प्रमुख प्रावधानों और उनकी व्यावहारिक प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया। एक लघु फिल्म भी दिखाई गई, जिसमें आईआईएसी के अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे को दिखाया गया और जटिल, ऊंचे स्तर की मध्यस्थता को प्रबंधित करने के लिए भारत की तत्परता का संकेत दिया गया।

तीसरा सत्र, ‘‘मध्यस्थता प्रक्रिया के दौरान सर्वोत्तम कार्यप्रणाली – एक चर्चा’’, मध्यस्थता की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए प्रक्रियात्मक और संस्थागत सर्वोत्तम अभ्यासों पर केंद्रित था। वक्ताओं ने संरचित केस प्रबंधन की वकालत की और यह सुझाव दिया कि संस्थागत नियमों के तहत उनके नियमितीकरण से स्पष्टता बढ़ेगी, समयसीमा में तेजी आएगी और मध्यस्थता प्रक्रिया में अस्पष्टता कम होगी। चौथा सत्र अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों से सीखने और भारत में मध्यस्थता इकोसिस्टम के लिए भावी परिदृश्य पर केंद्रित था। चर्चा में वैश्विक कार्यप्रणाली, आपातकालीन मध्यस्थता और पंच-निर्णय को और अधिक सुलभ बनाने के लिए कानूनी शोध सामग्रियों की सुविधा शामिल थी। तकनीकी सत्र आईआईएसी के अंशकालिक सदस्य श्री गणेश चंद्रू के धन्यवाद ज्ञापन के साथ संपन्न हुआ।

जैसा कि भारत तेजी से अपने वैश्विक पदचिह्न का विस्तार कर रहा है, इस सम्मेलन ने संस्थागत शक्ति और अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों पर आधारित मध्यस्थता उत्कृष्टता में देश के अगले बड़े कदम के लिए माहौल तैयार किया।

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